Vidyarambha


हिन्दू धर्म के अनुसार विद्यारंभ संस्कार बेहद आवश्यक माना गया है। विद्यारम्भ का अर्थ है कि बालक को शिक्षा के पारंभिक स्तर से परिचित कराना। पुराने समय में जब बच्चे शिक्षा के लिए गुरुकुल जाते थे तब इस संस्कार को अत्यधिक महत्त्व दिया जाता था। हालांकि आज के समय इस संस्कार को लोग भूलते जा रहे हैं।

विद्यारंभ का महत्त्व (Importance of Vidhyarambh Sanskar)

हिन्दू धर्म के अनुसार जिस प्राणी को विद्या नहीं आती, उसे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के चारों फलों से वंचित रहना पड़ता है। विद्या की प्राप्ति के लिए चूड़ाकर्म संस्कार या पांच वर्ष की आयु के बाद विद्यारंभ संस्कार किया जाता है।

कैसे किया जाता है विद्यारंभ संस्कार (How to Do Vidhyarambh Sanskar)

वैदिक मंत्रों और यज्ञादि द्वारा बालक को यज्ञोपवीत धारण कराकर, वेदाध्ययन कराया जाता है। विद्यारंभ संस्कार में मुख्य रूप से सात तरह की पूजा की जाती है जो निम्न है:

गणेश पूजन (Ganesh pujan)

हिन्दू धर्म अनुसार गणपति गजानन की पूजा प्रत्येक शुभ कार्य से पहले करने की प्रथा है।

सरस्वती पूजन (Sarasvati pujan): माता सरस्वती विद्या की देवी हैं। इसलिए विद्यार्थियों के लिए देवी सरस्वती की पूजा अनिवार्य मानी जाती है।
लेखनी पूजन (Lekhni pujan): कलम के बिना शिक्षा प्राप्त करना असंभव है। इसके महत्त्व को बनाए रखने के लिए लेखनी और दवात पूजा किया जाता है।
पट्टी पूजन (Patti pujan): कलम और दवात का उपयोग पट्टी या कापी पर ही किया जाता है। पट्टी की अधिष्ठात्री ‘तुष्टि’ अर्थात ‘श्रमशीलता’ और अध्ययन के लिए श्रम अत्यंत जरूरी है।
गुरु पूजन (Guru pujan): शिक्षा प्राप्त करने के लिए अध्यापक के पास जाना पड़ता है। जिस तरह एक गाय अपने बछड़े को दुग्धपान कराती है, ठीक उसी प्रकार अध्यापक अपने छात्रों को विद्या का अमृत पिलाता है। गुरु पूजा को सबसे अहम माना जाता है।
अक्षर लेखन पूजन (Akshar lekhan pujan): अक्षर लेखन पूजन के दौरान बालक से पट्टी पर गायत्री मंत्र लिखवाया जाता है, जिसे लिखने में अध्यापक बालक की मदद करता है।